हर साल पुरी दुनियाँ में होती है इतनी मौत 5.6 करोड़ क्यों

पुरी दुनियाँ में होती है इतनी मौत हर साल

जय माता दी दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हम लोग दुनिया में हर साल कितने मोतै होती है और किस कारन से होता है l इसी के बारे में आज हम लोग जानेंगे जो सायद बहुत ही चोकाने वाला रिपोर्ट है l

हर साल पुरी दुनियाँ में 5.6 करोड़ लोग मारे जाते हैं l और हर मिनट में 106 लोग मारे जाते हैं l ये सायद बहुत ही डराने वाले रिपोर्ट है, की पुरीं दुनिया में 106 लोग मारे जाना हर मिनट में l इसी में से 10 ऐसे घटना के बारे में जानेंगे जिस की वजहे से बहुत ही ज्यादा मौते होती है, हर साल l

1. दिल की बीमारियांसे हर साल 87.6 लाख मौत होती है l पुरी दुनियाँ में लेकिन आज के आधुनिक लाइफ स्टाइल में 30 से 40 साल की उम्र में ही लोगों को दिल के रोग होने लगे हैं. पिछले एक से दो दशकों में भारत में बैड लाइफस्टाइल, तनाव, एक्सरसाइज ना करने और बैड फूड हैबिट्स की वजह से लोगों को दिल संबंधित गंभीर रोग होने लगे हैं. WHO की रिपोर्ट के मुताबिक, ये दिल की बीमारि 1970 से 2000 के बीच 300 फीसदी बढ़ गई हैं.

2. स्ट्रोक से हर साल 62.4 लाख मौत होती है, पुरी दुनियाँ में, स्ट्रोक जिसे लकवा के नाम से भी जानते हैं, गंभीर बीमारी है और ये इससे प्रभावित लोगों और उनके परिवार पर इलाज और आर्थिक बोझ का दंश दे जाती है। अगर समय पर इलाज न मिले तो इसके घातक शारीरिक और मानसिक दुष्परिणाम होते हैं। स्ट्रोक के बाद मरीज को पूरे वक्त देखरेख, फिजियोथेरपी सेशन, डॉक्टरों के यहां के चक्कर और सलाह की जरूरत होती है। कम शब्दों में कहें तो स्ट्रोक एक इमर्जेंसी कंडिशन है।
क्या है स्ट्रोक?
स्ट्रोक जिसे कभी-कभी ब्रेन अटैक भी कहते हैं, ये तब होता है जब दिमाग तक ब्लड पहुंचने में रुकावट आ जाती है। उस जगह की दिमागी कोशिकाएं मरने लगती हैं क्योंकि उन्हें काम करने के लिए जो ऑक्सीजन और पोषण मिलना चाहिए, वो नहीं मिल पाता। स्ट्रोक किसी को भी हो सकता है, यहां तक कि बच्चों को भी। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ स्ट्रोक का खतरा बढ़ता जाता है। 55 साल के बाद हर दशक बढ़ने के साथ स्ट्रोक का खतरा डबल हो जाता है। स्ट्रोक पुरुषों में ज्यादा कॉमन होता है लेकिन स्ट्रोक से मरने वाले 50 फीसदी लोगों में महिलाएं होती हैं।

3. निमोनिया, दमा और फ्लू से हर साल 31.9 लाख मौत होती है l निमोनिया फेफड़ों का खतरनाक छूत है यह अक्सरहां खसरा, काली खांसी, फ्लू, दमा रोगों के बाद होता है बच्चों के लिए यह रोग बहुत ही खतरनाक होता है अधिक उम्र वालों और एड्स के रोगियों को भी निमुनिया हो सकता है l श्वास अल्पता के साथ आपात स्थिति सबसे आम रूप से दमा के कारण होती है l विकासशील और विकसित देशों में फेफड़ों की यह अतिसामान्य बीमारी है, जो कि कुल आबादी के 5% लोगों को प्रभावित करती है। अन्य लक्षणों में शामिल हैं: घरघराहट, सीने में जकड़न और एक सूखी खांसी. बीटा2-एड्रीनर्जिक एगोनिस्ट (सल्बूटमोल) प्रथम पंक्ति चिकित्सा है और फिर आमतौर पर तीव्र विकास होता है।

4. सांस की बीमारियां से हर साल 31.7 लाख मौतें होती है l विभिन्न शारीरिक मार्ग के कारण सांस की कमी हो सकती हैं, इनमें शामिल है केमोरिसेप्टर, मेकानोरिसेप्टर फेफड़ा रिसेप्टरl वर्तमान में यह माना जाता है कि डिस्पनिया के पैदा होने में तीन मुख्य घटक योगदान कर रहे हैं: अभिवाही संकेत, अपवाही का संकेत और केंद्रीय सूचना संसाधन. यह माना जाता है कि मस्तिष्क में सेंट्रल प्रोसेसिंग अभिवाही और अपवाही संकेतों की तुलना करता है और वह डिस्पनिया की अनुभूति में एक ‘बेमेल’ परिणाम है। अन्य शब्दों में, डिस्पनिया का परिणाम वायुसंचार (अभिवाही संकेतन) की जब आवश्यकता होती है तब वह शारिरीक श्वास द्वारा नहीं मिलती जो कि (अपवाही संकेतन) को पैदा करती है। अभिवाही संकेत, संवेदी नयूरोन संकेत हैं जो मस्तिष्क तक जाते हैं। श्वास अल्पता में महत्वपूर्ण अभिवाही न्यूरॉन्स विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न होते हैं जिसमें शामिल है मन्या निकाय, मज्जा, फेफड़े, छाती की दीवार. अंतस्था और मन्या निकायों में केमोरिसेप्टर, O2, CO2 और H+ के रक्त गैस स्तर के बारे में सूचना देते है।

5. फेफड़ों का कैंसर से हर साल 16.9 लाख मौत होती हैl फुफ्फुस के दुर्दम अर्बुद (malignant tumor) को फुफ्फुस कैन्सर या ‘फेफड़ों का कैन्सर’ (Lung cancer या lung carcinoma) कहते हैं। इस रोग में फेफड़ों के ऊतकों में अनियंत्रित वृद्धि होने लगती है। यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाय तो यह वृद्धि विक्षेप कही जाने वाली प्रक्रिया से, फेफड़े से आगे नज़दीकी कोशिकाओं या शरीर के अन्य भागों में फैल सकता है। अधिकांश कैंसर जो फेफड़े में शुरु होते हैं और जिनको फेफड़े का प्राथमिक कैंसर कहा जाता है कार्सिनोमस होते हैं जो उपकलीय कोशिकाओं से निकलते हैं। मुख्य प्रकार के फेफड़े के कैंसर छोटी-कोशिका फेफड़ा कार्सिनोमा (एससीएलसी) हैं, जिनको ओट कोशिका कैंसर तथा गैर-छोटी-कोशिका फेफड़ा कार्सिनोमा भी कहा जाता है।
फेफड़े के कैंसर का सबसे आम कारण तंबाकू के धुंए से अनावरण है, जिसके कारण 80–90% फेफड़े के कैंसर होता है। धूम्रपान न करने वाले 10–15% फेफड़े के कैंसर के शिकार होते हैं, और ये मामले अक्सर आनुवांशिक कारक रैडॉन गैस, ऐसबेस्टस और वायु प्रदूषण के संयोजन तथा अप्रत्यक्ष धूम्रपान से होते हैं। सीने के रेडियोग्राफ तथा अभिकलन टोमोग्राफी (सीटी स्कैन) द्वारा फेफड़े के कैंसर को देखा जा सकता है। निदान की पुष्टि बायप्सी से होती है जिसे ब्रांकोस्कोपी द्वारा किया जाता है या सीटी- मार्गदर्शन में किया जाता है।

6. डायबिटीज से हर साल 15.9 लाख मौत होती है, लिए इन्टरनेशनल डायबिटीज फेडेरेशन (आईडीएफ) द्वारा 14 नवम्बर को पिछले दो दशको से विश्व डायबिटीज दिवस हर साल मनाया जाता है। यह दिन डायबिटीज की खतरनाक दस्तक हैl
मधुमेह मेलेिटस टाइप 1 (जिसे टाइप 1 डायबिटीज़ भी कहा जाता है) मधुमेह के एक प्रकार का रोग है जिसमें पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन नहीं होता है। इंसुलिन की कमी का परिणाम उच्च रक्त शर्करा स्तर है।

7. अल्जाइमर और डिमेंशिया से 15.4 लाख मौत होती हैl डिमेन्शिया यानी मतिभ्रम मस्तिष्क संबंधी बिमारी है। इसमें मस्तिष्क कोशिकाओं की मृत्यु होने लगती है। कोशिकाओं के इस तरह – नष्ट होने के कारणों की जानकारी अभी तक नहीं हो पाई है। इसलिए इस बिमारी का पूर्ण निदान भी अभी संभव नहीं हो सका है। हाँ कुछ उपायों और औषधियों द्वारा कोशिकाओं के नष्ट होने की प्रक्रिया को धीमा करने में अवश्य सफलता मिली है। सामान्यतः वृद्धावस्था के साथ संबद्ध यह बिमारी व्यक्ति को दिमाग़ी रूप से तबाह कर देती है। इस बीमारी से प्रभावित व्यक्ति बातें भूलने लगता है, उसका अपने शरीर पर से नियंत्रण कम हो जाता है और वो आम लोगों की तरह व्यवहार नहीं कर पाता
अल्जाइमर रोग(अंग्रेज़ी:Alzheimer’s Disease) रोग ‘भूलने का रोग’ है। इसका नाम अलोइस अल्जाइमर पर रखा गया है, अल्जाइमर रोग में कोशिकाओं की उद्योग का हिस्सा काम करना बंद कर देता है, जिससे दूसरे कामों पर भी असर पड़ता है। जैसे-जैसे नुकसान बढ़ता है, कोशिकाओं में काम करने की ताकत कम होती जाती है और अंततः वे मर जाती हैं।

8. डायरिया और साफ सफाई संबंधी बीमारियां से हर साल 13.9 लाख मौत होती हैl यह अंतड़ियों में अधिक द्रव के जमा होने, अंतड़ियों द्वारा तरल पदार्थ को कम मात्रा में अवशोषित करने या अंतड़ियों में मल के तेजी से गुजरने की वजह से होता है। डायरिया से उत्पन्न जटिलताओं में निर्जलीकरण (डी-हाइड्रेशन), इलेक्ट्रोलाइट (खनिज) असामान्यता और मलद्वार में जलन, शामिल हैं। निर्जलीकरण (डी-हाइड्रेशन) को पीनेवाले रिहाइड्रेशन घोल की सहायता से कम किया जा सकता है और आवश्यक हो तो अंतःशिरा द्रव्य की मदद भी ली जा सकती है।

9. टीबी से हर साल 13.7 लाख मौत होती हैl यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या टीबी (tubercle bacillus का लघु रूप) एक आम और कई मामलों में घातक संक्रामक बीमारी है जो माइक्रोबैक्टीरिया, आमतौर पर माइकोबैक्टीरियम तपेदिक के विभिन्न प्रकारों की वजह से होती है। क्षय रोग आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह हवा के माध्यम से तब फैलता है, जब वे लोग जो सक्रिय टीबी संक्रमण से ग्रसित हैं, खांसी, छींक, या किसी अन्य प्रकार से हवा के माध्यम से अपना लार संचारित कर देते हैं। ज्यादातर संक्रमण स्पर्शोन्मुख और भीतरी होते हैं, लेकिन दस में से एक भीतरी संक्रमण, अंततः सक्रिय रोग में बदल जाते हैं, जिनको अगर बिना उपचार किये छोड़ दिया जाये तो ऐसे संक्रमित लोगों में से 50% से अधिक की मृत्यु हो जाती है।
ऐसा माना जाता है कि दुनिया की आबादी का एक तिहाई एम.तपेदिक, से संक्रमित है, नये संक्रमण प्रति सेकंड एक व्यक्ति की दर से बढ़ रहे हैंl एक अनुमान के अनुसार, 2007 में विश्व में, 13.7 मिलियन जटिल सक्रिय मामले थे, जबकि 2010 में लगभग 8.8 मिलियन नये मामले और 1.5 मिलियन संबंधित मौतें हुई जो कि अधिकतर विकासशील देशों में हुई थींl 2006 के बाद से तपेदिक मामलों की कुल संख्या कम हुई है और 2002 के बाद से नये मामलों में कमी आई है

10. सड़क हादसे से हर साल 13.4 लाख मौत होती हैl अप्रशिक्षित चालक(untrained driver)- भारत में आये दिन हो रही सड़क दुर्घटनाओं का मुख्य कारण यह भी हैं की यहाँ वास्तव में ही बिना किसी परीक्षा पास किये ही ज्यादातर शहरों,कस्बों और गावों में लोगों को लाइसेंस दे दिया जाता, सच तो यहाँ तक हैं की कभी-कभी जो आर.टी.ओ.(R.T.O.) के दलाल हैं वोह लोगों को कह देते हैं की आपको वहाँ जाना भी नहीं पड़ेगा और हम सब कुछ करवा देंगे आपको लाइसेंस आपके घर पर दे जाएंगे ज्यादातर यह भारत में महिलाओं के साथ हो रहा हैं वैसे पुरुष भी इस मामले में बहुत ज्यादा पीछे नहीं हैं, लेकिन भारत सरकार के ट्रांसपोर्ट मंत्रालय ने लाइसेंस देने की प्रक्रिया को काफी मजबूती दी हुई हैं, विभाग के अनुसार जब तक आप स्वयं जा कर अपना पेपर नहीं देंगे और आपको ट्रायल भी देना पड़ेगा तब तक आपको ड्राविंग लाइसेंस नहीं दिया जाएगा, लेकिन यह सब केवल मंत्रालय के कागजों और कार्यालयों के अंदर ही होता हैं, वास्तव में आर.टी.ओ.(R.T.O.)के ऑफिस में जहाँ पर यह पूरी प्रक्रिया होती हैं वहां पर यह सब काम केवल आर.टी.ओ.(R.T.O.) के सिपाही ही करते हैं वही आपकी परीक्षा देते हैं, वही बाकी की प्रक्रिया करते हैं आप अगर गए हैं तो बुत बनके बैठे रहिये बस, तो यहाँ भी जिम्मेदारी सरकार की ही निकल के आती हैंl

तो दोस्तों में उम्मीद करता हूँ की आप लोगों को ये आर्टिकल अच्छा लगा होगाl आप लोग इसे जरूर शेयर करने अपने फ्रेंड्स को facebook और whatsaap पे.

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