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शैव धर्म सामान्य ज्ञान

1. शैव हिन्दू धर्म के तीन प्रमुख देवताओं में एक भगवान शिव की उपासना करने वाले सम्प्रदाय के लोगों को कहा जाता है।

2. यह एक ऐसी परम्परा है, जिसमें भक्त शिव परम्परा से बंधा हो। यह प्राचीन काल में दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई थी।

3. भगवान शिव की पूजा करने वालों को शैव और शिव से संबंधित धर्म को शैवधर्म कहा जाता है। शिवलिंग उपासना का प्रारंभिक पुरातात्विक साक्ष्य हड़प्पा संस्कृति के अवशेषों से मिलता है।

4. ऋग्वेद में शिव के लिए रुद्र नामक देवता का उल्लेख है। अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति और भूपति कहा जाता है।

5. लिंगपूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्यपुराण में मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व से भी लिंग पूजा का वर्णन मिलता है।

6. वामन पुराण में शैव संप्रदाय की संख्या चार बताई गई है: (i) पाशुपत (ii) काल्पलिक (iii) कालमुख (iv) लिंगायत

7. पाशुपत संप्रदाय शैवों का सबसे प्राचीन संप्रदाय है। इसके संस्थापक लवकुलीश थे जिन्हेंभ भगवान शिव के 18 अवतारों में से एक माना जाता है।

8. पाशुपत संप्रदाय के अनुयायियों को पंचार्थिक कहा गया, इस मत का सैद्धांतिक ग्रंथ पाशुपत सूत्र है। कापलिक संप्रदाय के ईष्ट देव भैरव थे, इस संप्रदाय का प्रमुख केंद्र शैल नामक स्थान था।

9. कालामुख संप्रदाय के अनुयायिओं को शिव पुराण में महाव्रतधर कहा जाता है। इस संप्रदाय के लोग नर-पकाल में ही भोजन, जल और सुरापान करते थे और शरीर पर चिता की भस्म मलते थे।

10. लिंगायत समुदाय दक्षिण में काफी प्रचलित था। इन्हें जंगम भी कहा जाता है, इस संप्रदाय के लोग शिव लिंग की उपासना करते थे।

11. बसव पुराण में लिंगायत समुदाय के प्रवर्तक वल्लभ प्रभु और उनके शिष्य बासव को बताया गया है, इस संप्रदाय को वीरशिव संप्रदाय भी कहा जाता था।

12. दसवीं शताब्दी में मत्स्येंद्रनाथ ने नाथ संप्रदाय की स्थापना की, इस संप्रदाय का व्यापक प्रचार प्रसार बाबा गोरखनाथ के समय में हुआ। दक्षिण भारत में शैवधर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोलों के समय लोकप्रिय रहा।

13. नायनारों संतों की संख्या 63 बताई गई है। जिनमें उप्पार, तिरूज्ञान, संबंदर और सुंदर मूर्ति के नाम उल्लेखनीय है। पल्लवकाल में शैव धर्म का प्रचार प्रसार नायनारों ने किया।

14. ऐलेरा के कैलाश मदिंर का निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया। चोल शालक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर शैव मंदिर का निर्माण करवाया था। कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिंव और नंदी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है।

15. शिव के अवतार : शिव पुराण में शिव के भी दशावतारों के अलावा अन्य का वर्णन मिलता है, जो निम्नलिखित हैं- 1. महाकाल, 2. तारा, 3. भुवनेश, 4. षोडश, 5. भैरव, 6. छिन्नमस्तक गिरिजा, 7. धूम्रवान, 8. बगलामुखी, 9. मातंग और 10. कमल नामक अवतार हैं। ये दसों अवतार तंत्रशास्त्र से संबंधित हैंl 

16. शिव के अन्य 11 अवतार : 1. कपाली, 2. पिंगल, 3. भीम, 4. विरुपाक्ष, 4. विलोहित, 6. शास्ता, 7. अजपाद, 8. आपिर्बुध्य, 9. शम्भू, 10.चण्ड तथा 11. भव का उल्लेख मिलता है।

17. शैव ग्रंथ इस प्रकार हैं: श्वे1ताश्वतरा उपनिषद, शिव पुराण, आगम ग्रंथ, तिरुमुराई

18. शैव तीर्थ इस प्रकार हैं:- बनारस, केदारनाथ, सोमनाथ, रामेश्वरम, चिदम्बरम, अमरनाथ, कैलाश मानसरोवर

19. हिंदुओं के मुख्यकत:- 5 संप्रदाय माने गए हैं- शैव, वैष्णव, शाक्त, वैदिक और स्मार्त।

20. शैव मत का मूल रूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में है। 12 रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए।

21. शिव का निवास कैलाश पर्वत पर माना गया है। इनके पुत्रों का नाम है कार्तिकेय और गणेश और पुत्री का नाम है वनमाला जिन्हें ओखा भी कहा जाता था।

22. शैव धर्म के लोग एकेश्वरवादी होते हैं। वे शिवलिंग की पूजा ही करते हैं। शैव धर्म संन्यासी जटा रखते हैं। इसमें सिर तो मुंडाते हैं, लेकिन चोटी नहीं रखते।

23. इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं। इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं। ये निर्वस्त्र भी रहते हैं, भगवा वस्त्र भी पहनते हैं और हाथ में कमंडल, चिमटा रखकर धूनी भी रमाते हैं।

24. शैव संप्रदाय में समाधि लगाने की परंपरा है। शैव मंदिर को शिवालय कहते हैं, जहां सिर्फ शिवलिंग होता है। ये भभूति तिलक आड़ा लगाते हैं।

25. पाशुपत सम्प्रदाय का आधारग्रन्थ महेश्वर द्वारा रचित ‘पाशुपतसुत्र’ है। इसके ऊपर कौण्डिन्यरचित ‘पंचार्थीभाष्य’ है। इसके अनुसार पदार्थों की संख्या पाँच है – 1. कार्य 2. कारण 3. योग 4. विधि 5. दुःखान्त्

26. शैवमत के प्रधानतया चार सम्प्रदाय माने जाते हैं- 1. पाशुपत 2. शैवसिद्धान्त 3. कश्मीर शैवमत 4. वीर शैवमत पहले का केन्द्र गुजरात और राजपूताना, दूसरे का तमिल प्रदेश, तीसरे का कश्मीर और चौथे का कर्नाटक है।

27. कश्मीर शैवमत में जगत ब्रह्म का स्वातन्त्र्य अथवा आभास है। कश्मीर शैव की दो प्रमुख शाखाऐं हैं- 1. स्पन्द शास्त्र 2. प्रत्यभिज्ञा शास्त्र।

28. संसार में दुखों से आत्यन्तिक निवृत्ति ही दुःखान्त अथवा मोक्ष है।

29. जीव (जीवात्मा) और जड (जगत) को कार्य कहा जाता है। परमात्मा (शिव) इनका कारण है, जिसको पति कहा जाता है। जीव पशु और जड पाश कहलाता है। मानसिक क्रियाओं के द्वारा पशु और पति के संयोग को योग कहते हैं। जिस मार्ग से पति की प्राप्ति होती है उसे विधि की संज्ञा दी गयी है।

30. शैव साधुओं को नाथ, अघोरी, अवधूत, बाबा,औघड़, योगी, सिद्ध कहा जाता है।

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